अज्ञानता से उपजा विरोध
October 14, 2019 • बाराबंकी टाइम्स

स्कृति मनुष्य रचित उदात्त मधुमयता है। इसका जन्म वैदिक काल से पूर्व पूर्वजों की जिज्ञासा से हुआ। इसका विकास पूर्वजों के अनुभूत दर्शन व वैज्ञानिक दृष्टिकोण से हुआ। संस्कृति के बीज दर्शन में हैं। इसकी अभिव्यक्ति ऋचा, मंत्र, काव्य, साहित्य, कला, संगीत और उदात्त जीवनशैली में प्रत्यक्ष है। यह अनेक प्रतीकों में प्रवाहमान है। भूमि पूजन की परंपरा वैदिक काल से है। ऋग्वेद में धरती माता है। 'वंदे मातरम्' राष्ट्रगीत है। इसका मूल भाव अथर्ववेद का भूमि सूक्त है। कुंभ कलश और स्वास्तिक सांस्कृतिकप्रतीक हैं। दीप प्रज्वलन, उत्सव, पर्व और संस्कार भी संस्कृति के भाग हैं। भारत का मन इनमें आश्वस्ति पाता है। शस्त्र राष्ट्र रक्षा आत्मरक्षा के उपकरण हैं। 'शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे' प्राचीन सूक्ति है। शस्त्र पूजन प्राचीन परंपरा है। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने पेरिस में भारत को मिले पहले राफेल विमान की पूजा की। कांग्रेस नेता मल्लिकाजरुन खड़गे सहित तमाम कांग्रेसजनों ने पूजन को तमाशा बताया है। इस पर खासी बहस चल निकली है।

इतिहास बोध व सांस्कृतिक राष्ट्र में खड़गे का विश्वास नहीं है। शस्त्र पूजन अंधविश्वास नहीं है। यहां वैदिक काल में कृषि कर्म से जुड़ा हल पूजन भी था। भारतीय सेना में हर साल शस्त्र पूजन होते हैं। सुजनों की रक्षा व दुष्टजनों को दंडित करने में शस्त्रों की भूमिका है। 'परित्रणाय साधूनाम, विनाशाय च दुष्कृताम' गीता का ही संदेश है। ऐसे पूजन सांस्कृतिक प्रतीक हैं। पं. नेहरू ने भी विशाखापत्तनम में 1948 में जल ऊषा जलयान के जलावतरण पर ऐसी ही पूजा की थी। कांग्रेस नेता और पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी की पत्नी एलिजाबेथ ने वैदिक रीति से ही संपन्न आइएनएस विक्रांत के लोकार्पण में हिस्सा लिया था। एलिजाबेथ ने सिंदूरी कुमकुम से क्रॉस बनाकर पूजन संपन्न किया था। खड़गे जैसे मित्र ऐसे प्रसंग याद नहीं रखते। ऐसी परंपराएं भारतीय संस्कृति का भाग हैं। भारत अपनी सांस्कृतिक निरंतरता के कारण ही जीवमान राष्ट्र है। संस्कृति राष्ट्र का प्राण है। संस्कृतिविहीन राष्ट्र की मृत्यु निश्चित है।

दुनिया की तमाम प्राचीन संस्कृतियां व सभ्यताएं नष्ट हो गईं। मिस्नी सभ्यता का लोप हो गया। सुमेरी, असीरियाई और बेबीलोनियाई संस्कृतियां अब इतिहास शेष हैं। प्राचीन ग्रीस और रोम की संस्कृतियां भी अब कहां हैं, लेकिन भारतीय संस्कृति हजारों वर्ष से निरंतर प्रवाहमान है। मार्क्‍सवादी विद्वान डीडी कोशंबी ने 'प्राचीन भारत की संस्कृति व सभ्यता' में लिखा है, 'मिस्न की महान अफ्रीकी संस्कृति में वैसी निरंतरता नहीं है जैसी हम भारत में हजारों वर्षो से देखते आए हैं। मिस्नी, मेसोपोटामियाई संस्कृतियों का अतीत अरबी संस्कृति के पीछे नहीं जाता।' तमाम संस्कृतियों का ऐसा विवेचन कर कोशंबी लिखते हैं- 'इसके विपरीत भारत की ओर से किसी प्रकार के बल प्रयोग के बिना ही भारतीय धर्म-दर्शन का चीन और जापान में स्वागत हुआ। इंडोनेशिया, वियतनाम, थाई, बर्मा और श्रीलंका के सांस्कृतिक इतिहास पर भारत का प्रभाव पड़ा। भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है इसकी निरंतरता।' मूल प्रश्न है कि क्या छद्म सेक्युलरों का एजेंडा भारत की सांस्कृतिक निरंतरता को तोड़ना है? आखिरकार भारतीय सांस्कृतिक प्रतीकों एवं प्रतिमानों के विरोध का उनका उद्देश्य क्या है?

संविधान निर्माता भारतीय संस्कृति की राष्ट्र संवर्धन क्षमता से परिचित थे। डॉ. आंबेडकर ने स्वयं लिखा था कि भारतीय लड़ते-झगड़ते हैं, लेकिन संस्कृति उन्हें एक बनाए रखती है। संविधान की मूल प्रति में इसीलिए सांस्कृतिक राष्ट्रभाव वाले 23 चित्र जोड़े गए थे। इनमें श्रीराम और श्रीकृष्ण के चित्र हैं। वैदिक कालीन गुरुकुल आश्रम व श्रीकृष्ण-अजरुन के प्रश्नोत्तर वाला चित्र व गंगावतरण सहित अन्य सांस्कृतिक प्रतीक चित्र हैं। संविधान सभा की 26 नवंबर, 1949 की कार्यवाही में अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा, 'अब सदस्यों को संविधान प्रति पर हस्ताक्षर करने हैं। हस्तलिखित अंग्रेजी की प्रति पर कलाकारों ने चित्र अंकित किए हैं।' दुनिया की किसी भी संस्कृति में ईश्वर पर तर्क की परंपरा नहीं है। भारत में ईश्वर पर भी प्रश्न परंपरा है। संविधान सभा में राष्ट्रपति के शपथ प्रारूप में 'ईश्वर' जोड़ने पर दिलचस्प बहस हुई। एसवी कामथ ने कहा कि 'ईश्वर को संविधान में स्थान मिलना चाहिए।' महावीर त्यागी ने कहा, 'ईश्वर कहीं नहीं भुलाया गया।' केएम मुंशी ने कहा कि 'संस्कृति में ईश्वर है।' लंबी बहस का समापन करते हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा कि ईश्वर या सत्यनिष्ठा दोनों ही शपथ में विकल्प होंगे। भारतीय संस्कृति में आत्म स्वतंत्रता एक खूबसूरत तत्व है। यह सर्व समावेशी है।

संस्कृति दार्शनिक विवेक की उपलब्धि है। यहां सतत शोध और बोध का वातावरण रहा है। पं. नेहरू ने 'संस्कृति के चार अध्याय' की भूमिका में लिखा, 'संस्कृति की अनेक परिभाषाएं मिलती हैं। संस्कृति शारीरिक मानसिक शक्तियों का प्रशिक्षण व विकास है। यह सभ्यता का भीतर से प्रकाशित होना है।' दीप प्रज्वलन दिव्य प्रकाश को ही नेह निमंत्रण है। ऋग्वेद के अंतिम सूक्त में पूर्वकाल की सांस्कृतिक परंपरा का उल्लेख है, 'मन समान, हृदय एक। समिति समान, मंत्रणा समान। ऐसी उपासना पूर्वकाल में पूर्वज करते रहे हैं-यथा पूर्वे संजानाना उपासते।' यहां सरस्वती उपासना की भी परंपरा है। सरस्वती ऋग्वैदिक अभिजनों की 'नदीतमा' नदी थीं। तट पर यज्ञ थे, गीत थे, मंत्र थे, शोध थे। वह स्वाभाविक ही वाग्देवी हुईं। कलाधर्मी उनकी स्तुति करते हैं, लेकिन ऐसे कार्यक्रमों में सरस्वती उपासना को भी हंिदूू कर्मकांड बताया जाता है। आखिरकार हंिदूू संस्कृति के प्रतीक सेक्युलर मित्रों को इतने बुरे क्यों लगते हैं?

दुनिया का सबसे बड़ा संगमन कुंभ है। क्या कुंभ को हंिदूू पर्व कहकर खारिज कर देना चाहिए। योग का विकास वैदिक पूर्वजों ने किया था। पतंजलि ने सूत्रबद्ध किया। क्या इस विज्ञान को हंिदूुओं द्वारा खोजा गया जानकर खारिज कर सकते हैं? भारतीय संस्कृति अंधविश्वास नहीं। इसका एक दर्शन है। दर्शन अंधविश्वास काटता है। इस संस्कृति का एक विचार शास्त्र है। विचार शास्त्र से व्यवहार शास्त्र का विकास हुआ है। व्यवहार शास्त्र से रीतिरिवाज बने हैं। यहां विचार और व्यवहार की एकता के प्रयास चला करते हैं। इसके लिए यहां अनेक प्रतीक हैं। काव्य, साहित्य संगीत सांस्कृतिक प्रवाह को गति देते हैं। संस्कृति में समाज के श्रेय आदर्श हैं। प्रेय व श्रेय साथ-साथ भी हैं। स्वास्तिक, तिलक जैसे सांस्कृतिक प्रतीकों के अपने उपयोग हैं। वे लोक व्यवहार को आच्छादित करते हैं। दर्शन और विज्ञान रूढ़ि और अंधविश्वास काटते हैं। हंिदूू संस्कृति में प्रत्येक विचार के प्रति आदर है। ऋग्वेद के ऋषि ने स्तुति की है, 'मेरे पास सभी दिशाओं से शुभ विचार आएं-आ नो भद्रा क्रतवो यंतु विश्वत:।' भारत की संस्कृति में विद्वानों ने अंकों का आविष्कार किया। अंकगणित भारत से अरब गया और अरबों से अन्य देश। क्या सेक्युलर मित्र अंकगणित सहित हंिदूुओं द्वारा खोजे गए समस्त ज्ञान-उपासना को हंिदूू होने के आरोप में निरस्त करने को ही तत्पर हैं?